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Friday, 12 October 2012

" मेरी कल्पना का पारिजात"






सुलझे अनसुलझे से प्रश्नों की आंधी आती है !!
और मेरी कल्पनाओं के उस पारिजात के सारे पत्ते झड़ा जाती है। जिसमें अभी-अभी तुम्हारी स्मृतियों के पुष्प पल्लवित होने लगे थे।वृक्ष की कोपलों ने हरे-कच चमकीले पत्तों का आकार लिया ही था और उसकी शाखों  के सिरो पर नुकीली-नुकीली कलियों के गुच्छों में कुछ कलियाँ,श्वेत कोपलों और सिंदूरी वर्ण की शोभा से सज्जित सुंगंधित पुष्पों का रूप लेने के लिए रात्री की प्रतीक्षा कर रही थीं, आतुर थीं उन स्मृतियों की सुगंध बिखेरने को जो तुमसे मैंने उपहार स्वरुप पायी हैं।

 








चन्द्रमाँ की चांदनी बिखेरती हुयी यामिनी में जब रातरानी मुस्कुराती है,और कुमुद-कुमुदनी गाते हैं प्रेम के गीत, शीतल समीर बहती है मंद मुस्कान लिए, झींगुर के स्वर गूंजते हैं  निशा की गोद में।
ऐसे निरीह  वातावरण में कितना सुखद होता  तुम्हारी स्मृतियों की सुगंध में विलीन हो जाना,और सूर्योदय होते ही झर जाना निश्छल प्रेम के जैसे और बिखर जाना धरा पर हिमकणों के समान। शोभायमान कर देना उसको भी उस प्रेम की पराकाष्ठा की उस अद्भुत अनुभूति से,जो तुम्हारी स्मृतियों की सुगंध मात्र में विलीन होकर मैंने प्राप्त की होती।


कल्पना में ही सही ह्रदय को प्रेम की पराकाष्ठा की अनुभूति तो होती !!

अरे अभी तो पतझड़ आने में भी विलम्ब था !!
पर उस निष्ठुर आंधी ने जरा भी विचार न किया !!

हाँ निष्ठुर ही तो है,
जो प्रेम से ही अनभिज्ञ है।।
विदित नहीं जिसे,
मूक अक्षियों के आमंत्रण।।
ज्ञात नहीं जिसे अर्थ,
निःशब्द प्रेम  के वार्तालाप का।।
न सुन सके जो,
पलकों के उत्थान-पतन में निहित गाथा को।।
 नहीं पढ़ सके जो,
अधरों पर क्षत-विक्षत से पड़े वाक्यों को।।

तब से जब भी चलती है वह आंधी,
थाम लेती हूँ मस्तिष्क में ही उसको अपने।
ह्रदय तक पहुँचने ही नहीं देती उस निष्ठुर को !!
क्यूंकि  मेरी कल्पना के पारिजात के धवल पुष्पों को,
तुम्हारी स्मृतियों की सुगंध बिखेरना है अंतस में।।
और फिर प्रेम में तुम्हारे झर जाना है उन पुष्पों को,
समर्पित कर देना है अपने आप को तुम्हारे लिए।।

निः संशय यही प्रेम है !!

47 comments:

  1. Sundar Kalpit Rachna aur bhaw ... badhai

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  2. और फिर प्रेम में तुम्हारे झर जाना है उन पुष्पों को,
    समर्पित कर देना है अपने आप को तुम्हारे लिए।।

    एक परिपक्व कलम की सुन्दर पंक्तियाँ ....

    बधाई ...!!

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    1. धन्यवाद हरकीरत जी

      सादर

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  3. कल्पना के पारिजात पुष्प -पल्लवित होता रहे. ह्रदय असीम प्रेम से लबालब भरा रहे और हमे आपकी काव्य रस धारा का पान करने को मिलता रहे . बहुत सुन्दर , मन प्रफुल्लित हुआ .

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    1. आशीष जी आपकी शुभकामनाओं के लिए बहुत आभारी हूँ......
      बस आपसे सीखते हुए आगे बढ़ रहे हैं :)
      सादर

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  4. सुन्दर भावपूर्ण कविता ।

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    1. धन्यवाद सुरेंदर पाल जी
      सादर

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  5. Replies

    1. धन्यवाद महेंद्र जी
      सादर

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  6. क्या बात है मीनाक्षी ......खूबसूरत भाव से सज़ा लेखन

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    1. धन्यवाद अंजू जी
      सादर

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  7. Bahut sundar rachna aur sundar tasveeren...

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  8. Bahut sundar rachna aur sundar tasveeren...

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  9. बहुत सुंदर अभिव्यक्ति.

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    1. धन्यवाद रचना जी
      आभार आपका....

      सादर

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  10. http://bulletinofblog.blogspot.in/2012/10/blog-post_16.html

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    1. बहुत बहुत शुक्रिया रश्मि दी...

      इसके लिए मैं आपकी आभारी हूँ... :)
      आपका आशीर्वाद सदा बना रहे
      सादर

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  11. बहुत ही उम्दा रचना...गहरी अभिव्यक्ति |

    सादर |

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    1. धन्यवाद मन्टू कुमार जी
      सादर

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  12. बहुत सुन्दर सृजन, बधाई.

    कृपया मेरे ब्लॉग पर भी पधारने का कष्ट करें, आभारी होऊंगा.

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    1. बिलकुल शुक्ला जी
      आभार आपका
      सादर

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  13. वाह....
    बहुत सुन्दर!!!!!

    मन महका गयी...
    सस्नेह
    अनु

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    1. मिनी आंटी !!
      हरसिंगार पर अभी तक कभी कुछ लिखा नहीं था.. पहली बार तरी किया :)
      आपने सराहा... धन्यवाद आपका

      <3

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  14. बेहतरीन अभिव्यक्ति ...

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    1. शुक्रिया सतीश जी...
      बहुत बहुत आभार आपका

      सादर

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  15. स्मृतियाँ हमारे मन मष्तिष्क में जिस अनुपात में गहरी पैठ बनाते हैं उनका प्रस्फुटन भी उसी अनुपात में जब-तब अनुकूल/प्रतिकूल परिस्थितियों हमारे सम्मुख होता है .....बहुत सुन्दर लगी आपके यह प्रस्तुति ...
    विजयादशमी की हार्दिक शुभकामनाओं सहित ...

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  16. स्मृतियाँ हमारे मन मष्तिष्क में जिस अनुपात में गहरी पैठ बनाते हैं उनका प्रस्फुटन भी उसी अनुपात में जब-तब अनुकूल/प्रतिकूल परिस्थितियों हमारे सम्मुख होता है .....बहुत सुन्दर लगी आपके यह प्रस्तुति ...
    विजयादशमी की हार्दिक शुभकामनाओं सहित ...

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    Replies
    1. धन्यवाद कविता जी....

      आपको और आपके परिवार को भी विजयादशमी पर्व की हार्दिक शुभकामनाएं....

      सादर

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  17. उम्दा रचना

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  18. शायद सच है , सिर्फ शब्द संजोने से कविता का सृजन नहीं होता ! अंतर्मन से महसूस कि गयी अनुभूतियों को शब्दों का श्रींगार देना ही सृजन है. ! एक सॉफ्टवेर इंजिनियर से ऐसी उम्मीद वाकई विस्मय कारी है. अति उत्तम शब्दों का चयन और गति अतुलनीय.....!! लिखते रहिये

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  19. और फिर प्रेम में तुम्हारे झर जाना है उन पुष्पों को,
    समर्पित कर देना है अपने आप को तुम्हारे लिए।।
    :)
    अलौकिक भाव !

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  20. बहुत सुंदर अभिव्यक्ति ....
    शब्द नहीं मिल रहे भाव अभिव्यक्त करने को ....
    शुभकामनायें मीनाक्षी...

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  21. बहुत सुंदर भाव-बोध .... एक प्रांजल जीवन-दर्शन से संबलित प्रेम-भाव.... बल्कि यूं कहा जाए प्रेम आत्‍मा में यूं सन्निहित है कि जीवन-दर्शन स्‍वभावत: साफ है... जीवन-दर्शन यहां कोई दर्शन नहीं कोई ज्ञान नहीं ... यहां प्रेम एक स्‍वभाव की तरह व्‍यक्‍त है... यहां स्‍वभावत: पता है कि विचार आंधियां मस्तिष्‍क और मात्र मस्तिष्‍क का गुण-धर्म है और इन्‍हें मस्तिष्‍क में ही थाम लेना है ... कल्‍पना निर्दोष है ... कल्‍पना को प्रदूषणों से बचा लेने का हौसला है ... यहां प्रेम सुगंध है और प्रेम समर्पण है ... यह समर्पण मूल्‍य-रूपी विचारों की यानि मस्तिष्‍क की निर्मिति नहीं है ... यह अंतस में खिला फूल है ... बहुत सुंदर कविता ... आपको बधाई ..

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